Friday, April 13, 2012

रघुवीर सहाय की स्नेहिल उष्मा : सुधेंदु पटेल



वे उतरती सर्दियों के उजले दिन थे जब इलाहाबाद में मैंने पहली बार सहायजी को देखा-सुना और उनसे उनकी एक टिप्पणी पर उलझने की हिमाकत की थी। उस दिन मैं बहस की मुद्रा में जितना उद्दंड हुआ था, वे उतनी ही मात्रा में संयत बने रहे थे। मुझमें उनकी पूरी बात सुनने का धैर्य तक न था और वे थे। कि मेरी बात जिज्ञासु की तरह सुनते, फिर सहजता से अपनी बात समझाते रहे थे लेकिन मैं अपनी अज्ञानता से तर्क-कुतर्क के साथ हठी ही बना रहा था। और यही वह बिंदु था, जहां हम एक दूसरे को भा गये थे। दिल्ली की चकाचैंध से बहुत दूर राजस्थान के एक पिछड़े आदिवासी अंचल के सर्वव्यापी अंधकार में डूबे गांव में जब सहायजी के निधन का समाचार सुना तो अलाव की लहकती आंच के बावजूद आंखों के आगे आस-पास का अंधेरा एकबारगी इतना घना हो उठा था कि कुछ भी सहसा न सूझा। कोहरे की एक परत दिमाग में आंखों के जरिये ऐसे पसरी कि पानी-पानी हो गया।


एक बार फिर मैं पितृहीन हो गया था। इस बार भी दिसंबर की दगाबाजी और दाह संस्कार में शामिल न होने की पीड़ा से तभी उबर पाया, जब यह बात दिमाग में आयी कि यदि किसी जुगत से सहायजी को यह बता पाता कि मैं उस दिन दाह संस्कार में इसलिए नहीं आ पाया, क्योंकि मैं पानी और रोशनी से वंचित लोगों के बीच उनकी पीड़ा की पड़ताल के लिए गया हुआ था। वे सुनकर हमेशा की तरह वहां के अनुभव से जुड़ी-छोटी-से-छोटी समझ पड़ने वाली बातें पूछते। एक जिज्ञासु की तरह अनुभव में साझेदारी के लिए न केवल आकुल होते, अपितु तत्काल अनुभवों को लिखकर दर्ज करने की स्नेहिल हिदायत भी देते, जिसे टाला नहीं जा सकता था। मेरे संतोष के लिए अब अनुभवजन्य कल्पना ही शेष बच रही है।
मैं भूल नहीं पाता हूं। बरसों हुए ‘आज’ अखबार में पलामू के बारे में छपी एक छोटी से खबर से इस कदर उद्वेलित हुआ था कि रहा नहीं गया, उसी शाम अपने एक मित्र रामकृष्ण साहा के साथ पलामू की ओर निकल गया। मुगलसराय से प्रारंभ हुई रेल के अंधेरे डिब्बों की यातनादायक सफर ने पलामू के जंगलों की  आपकी यात्रा का संक्षिप्त परिचय मिला, उसी से मन व्याकुल हो उठा है। हिंदुस्तान की जिंदगी का अधिकार सिमट कर कितने कम हाथों में आ गया है, यह दिल्ली में रोज देखता हूं, और यहीं लोग मानवता की बात करते हैं मेरे जैसे जाने-कितने मध्यवर्गीय लेखक इसी अधिकारी वर्ग के मंडल के चक्र के अंश हैंः वे भी मानवीय अनुभूति और नियति और संत्रास की बात करते हैं। पर यह जानना कि वे कितने अधूरे आदमी हैंः, एक ऐसा संत्रास है, जिसे बाकी आदमी को जाने बिना जाना नहीं जा सकता। उसे बिना जाने किस संत्रास की बात आज का कवि बहुधा करता है, वह वास्तव में सत्ता और शक्ति के प्रभामंडल में अपनी दयनीय स्थिति जानने को पीड़ा है, बल्कि पीड़ा ही नहीं, निरी ग्लानि है-पीड़ा हो, तो शायद वह अपने उस प्रतिरूप को भी जानना चाहे, जो हिंदुस्तान की जिंदगी से कटे हुए लोगों में मिलेगा-जो आप अभी देख कर आ रहे हैं।
आपने जो कुछ भी देखा, सुना, समझा और आपके भीतर जो कुछ भी हुआ। शब्दश दिमान के माध्यम से हजारों अपने-जैसे मध्यवर्गीय कूपमंडूकों को पहुंचा सकूं, तो कृतज्ञ होऊंगा-उसी सच्चे अर्थों में कृतज्ञ। और आपके इस मुक्तिदायक अनुभव में साझे का निजी संतोष तो मुझे मिलेगा ही। पत्र पाते ही आप लिखने बैठ जायंेः मैं वह सब पढ़ने को अधीर हो रहा हूं। आकार शैली आदि की कोई कैद नहीं हैं, जो आपको स्वाभाविक जान पड़े वही करें। आपका, रघुवीर सहाय
वे मानवीय गरिमा की बात सिर्फ बतियाते ही नहीं थे, उसका हर-पल ख्याल भी रखते थे। मानवीय अस्मिता और सामाजिक सरोकारों से जुड़ी पत्रकारिता का नारा लगाये बगैर उन्होंने ‘दिनमान’ के जरिये मेरे-जैसे जाने-कितने दिग्भ्रमितों में पत्रकारिता की बुनियादी वसूलों को रोपने का बड़ा काम किया, उसे मुझ जैसे नाकारा पत्रकारों के जरिये शिनाख्त करना संभव नहीं है। लेकिन उनकी दृष्टि का अनुकरण करते हुए मैंने न केवल पत्रकारिता अपितु समाज और परिवार को बड़े व्यापक क्षितिज से जोड़कर समझने की जो दृष्टि उनसे पायी, उसने मुझे कभी अकेलेपन का एहसास होने ही नहीं दिया। यह आकस्मिक नहीं था कि वे एक आत्मीय ऊष्मा....अपनी अनुपस्थिति में भी वे आत्मीयों के बीच बिखेरे रहते थे। उनकी यह मोहक बात सिर्फ जिंदगी के सरोकारों में ही नहीं, लेखन में भी हर कहीं पाई जाती है। एक बार की बात है। वे बनारस में दंगा कवर करने आये। मैं साथ-साथ प्रभावित इलाकों में गया। उन्होंने मुझे कहा कि आपको ही लिखना है। वे फोटो उतारते रहे और बीच-बीच में कुछ नोट भी करते रहे थे। रपट मैंने ही लिखी थी, लेकिन जब पढ़ा तो मैंने पाया कि, ‘मारते वहीं जिलाते वहीं’ शीर्षक के अलावा मेरे लिखे हुए को बिना छेड़े उन्होंने ऐसी पंक्तियां जोड़ी थीं, जिसके बगैर रपट तथ्यात्मक तो होती, किंतु लोगों के भीतर की कोई हलचल पाठकों तक नहीं पहुंच पाती। मैंने अपनी ही लिखी हुई रपट को पढ़ते हुए पत्रकारिता का वह पाठ पढ़ा था, जिसे सहायजी के स्पर्श के बिना शायद ही कभी पढ़ पाता। वे चिंगारी को आग में बदल देते थे। आदमी भाषा से मथा जा सकता है और नया चोला पा सकता है-सहायजी पल-पल अपनी कलम की नोंक से सिखलाते रहे थे, बिना किसी दंभ के कि वह कुछ सिखला रहे हैं।
बनारस उन्हें प्रिय था। वहां की गलियों में भांग छानकर घूमते हुए वे हमारे मित्र सरीखे हो जाते थे। जिज्ञासु तो वे बच्चे की तरह थे। उनके सवालों को सुनकर कभी-कभी मुझे अपना बचपन याद आ जाता था। यह भी कि आदमी को हमेशा चीजों के तह तक की बात जाननी चाहिए। उसे जीवनपर्यंत सीखने की ललक अपने भीतर जिलाये रखनी चाहिए। बनारस की गलियों-सड़कों और घाटों पर विजया की ठंडाई छानकर उनके साथ बीती कई शाम आंखों के आगे तिर आई हैं। उनके साथ बतकही का रस मिलता था। मूंगफली से, आम की भिन्न-भिन्न जातियों तक, लोहिया से कमलापति तक, शहद से मलाई तक, जीवन से मृत्यु तक की तासीर के बारे में बातें होती थीं। एक बार बनारस के मशहूर शवदाह स्थल मणिकर्णिका घाट पर देर रात गये बातें होती रही थीं। उस घाट से जुड़ी किंवदंतियों के बारे में शिशु-सुलभ जिज्ञासा से पूछते रहे थे। यह भी कि बरसात में जब गंगा का पानी बढ़ जाता हैं, तो कौन सी दिक्कतों का सामना दाह संस्कार वालों को करना पड़ता है, नगरपालिका की कैसी भूमिका होती है आदि-आदि। वे सिर्फ बतकही करके ही नहीं रह जाते थे। उन्हें टहलते हुए कही गयी बातें भी खूब याद रहती थीं। एक दिन अचानक पत्र मिला, ‘एक और महत्वपूर्ण बात। शीघ्र ही मैं अनेक नगरों में हिंदू-रीति के अनुसार मृतक के दाह-संस्कार के लिए उपलब्ध सुविधाओं पर एक बड़ा वृतांत प्रकाशित करना चाहता हूं। मणिकर्णिका घाट के बारे में आपसे कई बार बात हुई हैं, किंतु अभी तक उस पर कोई सामग्री नहीं मिली।’ दरअसल पत्रकारिता उनके लिए आंदोलन की तरह रही है। वे एक कार्यकर्ता की ही तरह पत्रकारिता के चैमुखी मोर्चे पर न केवल स्वयं सक्रिय रहे, अपितु बहुतेरों को उन्होंने सक्रिय बनाये भी रखा।
16 अप्रैल, 1974

प्रिय सुधेंदु जी,
नेपाली मंदिर संबंधी टिप्पणी और बिजुल में नदी पार करते लोगों के चित्र की पीठ पर लिखी आप की टिप्पणी मिली। आप अगोरी में शिविर कब लगाना चाहते हैं? मेरे लिए आना संभव हो सकता है, पर तारीख निश्चित कर के आप पहले बतायें।
3 फरवरी, 76

प्रिय सुधेंदु जी,
बनारस विश्वविद्यालय में डा. माधुरी बेन शाह ने स्त्रियों की शिक्षा आदि पर दो दिन के सम्मेलन में एक भाषण दिया था जिसमें उन्होंने स्त्री को कपड़ा मिल  में रात की पारी न करने दिये जाने का विरोध किया था। उस भाषण की एक प्रति मुझे चाहिए। क्या खोज कर भेज सकेंगे?
बनारस में ही खानों में सुरक्षा के संबंध में जो संगोष्ठी हुई थी, उस पर निबंध आदि जमा करके भेजने का आपने वायदा किया था। मैं उनकी प्रतीक्षा कर रहा हूं। गोदई महाराज से आप की भेंट की भी प्रतीक्षा है।
एक और महत्वपूर्ण बात मणिकर्णिका घाट के बारे में आप से कई बार बात हुई हैं किंतु अभी तक उस पर कोई सामग्री नहीं मिली।
आपके उत्तर की प्रतीक्षा रहेगी। मैं 7 तारीख से 4-5 दिन के लिए शायद मध्यप्रदेश में रहूंगा।
आपका, रघुवीर सहाय
6.7.77
प्रिय सुधेंदु जी,
आप का पत्र पाकर आनंद हुआ। वे जेल से मुक्ति और विवाह का बंधन दोनों ही आपने अनुभव कर लिया है, आप स्थितिप्रज्ञ कहें जा सकते हैं।
मैं आप की यायावरी की प्रतिभा से कितना मुग्ध हूं, कह नहीं सकता। आप ही जैसे व्यक्तियों के माध्यम से देश का हाल देश को मिलने की उम्मीद बनती है। जौरा में 14 से 26 तक के बागी शिविर के बारे में आप बहुत संक्षेप में चुने हुए मुद्दों को उठाये तो हमारे लिए उपयोगी हो सकता है। लौटते हुए आइयेगा तो दिल्ली में रूक सकंे और मिल सकंे तो कृतार्थ होऊंगा। आप दोनों को सस्नेह, रघुवीर सहाय


स्मृति दर-स्मृति....कितनी बातें! कितने ही पहलू! एक बार बनारस में डा.ब.व. कारंत ने नाट्य प्रशिक्षण शिविर (1972) लगाया। उस अवसर पर सहायजी ने अपनी चुनी हुई अठारह कविताओं का साभिनय पाठा किया था। जिनमें कुछ गीत और शेष नयी कविताओं के नमूने थे। यह एक नया प्रयोग था, जिसमें कविता को भाषा और ध्वनि के खंडों में, भावानुकूल उतार चढ़ाव, अंतराल और संदर्भ-बिंदुओं पर आघात देते हुए कवि के व्यक्तिव और कविता के व्यंग्य को नाटकीय स्तर पर उभारने में सहायजी ने कविता और मंच दोनों को एक नया आभास दिलाया था। इसमें रेखांकित करने वाली एक खूबी यह थी कि आकृति विरूपण और कायिक अभिनय वहां प्रदर्शन न होकर इतने सहज थे कि कहीं भी कलाकार वास्तविक व्यक्ति  से इतर नहीं लगा था। उनके इस काव्याभिनय के पीछे संगीत की गहरी समझदारी थी।

उनके समूचे जीवन और व्यवहार में एक अद्भुत लयकारी थी। वे परिवर्तन के निमित्त संघर्षशील युवजनों के लिए हमेशा एक साथी की तरह रहे। उन्होंने जीवन को समग्रता में जिया और यही वे बतलाते भी रहे थे। उनसे जुड़ी ढेरों स्मृतियों के बीच उनका यह एक वाक्य मुझे हमेशा बल देता रहा है-संघर्ष और जेल, पत्रकारिता और परिवार, प्रेम और विवाह, और समय से जूझते हुए जब कभी निराशा ने घेरा है, उनसे दूर रहकर भी उनकी हथेली की ऊष्मा को मैंने अपने कंधों पर बराबर महसूसा है, अब भी और आज उनकी अनुपस्थिति में भी, जबकि मन अवसाद से भरा हुआ है। देश और दुनिया की जटिल से जटिल होती स्थितियों के बीच भी मनुष्य की रचनात्मकता पर अटल विश्वास रखने वाले सहायजी की आवाज कानों में गूंज रही है, ‘सुधेंदुजी, काम की सुगंध फैलती है, निराश न हों’। और अब, इस वाक्य की ऊष्मा ही मेरी थाती हैं।

Sunday, May 29, 2011

दारुण दाघ निदाघ

 र्मी का मौसम सिर्फ पारे के चढ़ने का ही मौसम नहीं है | यह मौसम है गर्मी की तपन से बेहाल शेर और बकरी को एक ही घाट पानी पिला देनेवाले और एक ही पेड़ तले छहाने के लिए रोक  देने वाले दिनों का भी| इस लिहाज़ से गर्मी बेहतर मौसम कहा जा सकता है कि इसकी आगोश  में आकर अमीर और गरीब का फर्क मिट जाता है - जाड़े का इलाज़ है गर्म कपड़ा,जिसकी बहुतायत सिर्फ उन्ही लोगों के लिए मुमकिन है, जिनकी जेबें चांदी की खनक से गूंजती हों, लेकिन गर्मी उस गरीब आदमी को भी अपनी गोद में लेने से गुरेज नहीं करती, जो न हो कमीज़ तो पांवों से ही पेट ढक लेने को मजबूर है, लेकिन गर्मी का आगोश मौत का आगोश भी साबित होता है-खासकर उन लोगों के लिए जिनके पास छतें  नहीं होती-जिनके पेट में दाने नहीं होते, गर्मी की तपन भरी अंधड़ उन्हें कुछ ज्यादा ही परेशां भी करती है, हिंदुस्तान  जैसे   गरीब देश   के लिए गर्मी का मौसम लू  से होने वाली मौतों का जैसे एक विस्तृत शमशान सा बन जाता है, हालाँकि अपने जलवायु के हिसाब से हिंदुस्तान गर्म देश है,  इस नाते गर्मी को बर्दाश्त करने की क्षमता आम भारतीय आदमी में किसी ठन्डे मुल्क के बाशिंदे के मुकाबले कंही ज्यादा होती है, लेकिन जैसे किसी भी चीज़ की सहनशीलता की एक निश्चित सीमा होती है, उसी तरह हिन्दुस्तानी आम आदमी की भी सहनशीलता गर्मी को झेलने की निस्बत| सूरज के चारों तरफ घूमती धरती के नियम के कारण हर साल गर्मी आती है और इसी के साथ शुरू होता है लू के थपेड़ों से सुनी होती मांगों का सिलसिला, उजडती गोदों का सिलसिला और पथराये नयनों से जुड़े हाथों की छिनती लाठी का सिलसिला| मौतों का अंतहीन क्रम अब हमारे समाज की ऐसी नियति  बन चुका है कि आम सड़क दुर्घटना से मरने वाली एक जान की खातिर ढेरों शोक  संदेशों की झड़ी लग जाती है और शुरू हो जाता है इस अध्ययन का दौर कि मौत आखिर हुई तो क्यों ?- ताकि फिर इस तरह किसी की मौत से बचा जा सके, लेकिन मौसम के चलते होनेवाली आए दिन की ऐसी मौत महज़ 'रूटीन मौत' बन जाती है और उभरती है अखबार के पन्नों में छोटी-मोटी भरान ख़बरों (फिलर न्यूज़) के तौर पर, लेकिन कभी  ऐसी मौतों का सिलसिला रोकने के बारे में कोई वैज्ञानिक पहल नहीं होती, हमारे समाज के प्रति हमारी इमानदारी पर निश्चित ही यह स्थिति  सवालिया निशान टांकती है, इससे उबरे बिना भारतीय समाज यह कह सकने के काबिल न हो पायेगा कि अपने समाज से उसका जुडाव मानवीय धराताल पर है |

Tuesday, April 5, 2011

अज्ञेय-स्मरण


मृण्मय से चिन्मय तक का सफर

अज्ञेय को स्मरण करते ही ‘लट्टू’ की तरह उनसे जुड़ी स्मृतियां दिमाग में थिरकने लगी हैं। यह महज संयोग ही था कि जब यौवन की बारादरी में कदम रखा ही था तभी उन्हीं दिनों काशी स्थित नेपाली पुस्तकालय, दूधविनायक (नेपाली क्रांतिकारियों का मुख्य केन्द्र) के प्रभारी श्रेष्ठजी ने ‘शेखरः एक जीवनी’ साग्रह पढ़ने को दी थी। उनदिनों घरेलू माहौल के कारण बंगला साहित्य ज्यादा पढ़ता था। हिन्दी भक्ति साहित्य (दण्डी स्वामियों की संगत में) से इतर अज्ञेय, राहुल, और यशपाल की रचनाओं से ही मैंने हिन्दी साहित्य की बारहखड़ी प्रारंभ की थी। ‘शेखर’, ‘झूठा-सच’ पढ़ने के साथ ही अपने बंगलाभांषी हिन्दी अध्यापक सुनील मुखोपाध्याय से पता चला था कि अज्ञेय क्रांतिकारी भी रहे हैं। मेरे लिए उनदिनों इतना भर काफी था कि फंला नामधारी दुनिया बदलने का हौसला रखता रहा है। डाॅ. राममनोहर लोहिया मेरे तत्कालीन ‘नायक’ थे। गांधी, सुभाष, सावरकर, भगतसिंह लगायत तमाम-तमाम देशी-विदेशी क्रांतिकारियों से रिश्ता महसूस करता था।
दरअसल, हिन्दी के औघड़ साहित्यकार राजकमल चौधरी  के अभिन्न मित्र छायाकार एस. अतिबल के संगत में मैं साहित्य की भीतरी संसार की ‘टुच्चई’ से रूबरू हो रहा था। जहां अकेले अज्ञेय एक तरफ और बाकी सारे साहित्य के ‘कौरवी’ जमात की अफवाहें थीं, कुछ सच्ची, अधिकांश झूठी होती थीं। उस दौर में कवि अज्ञेय को लेकर कई-कई परतों वाले किस्से सुनता रहता था। वे बहुत कम बोलते हैं, रसिक हैं, डेढ़ दर्जन भाषाएं जानते हैं, अच्छे छायाकार भी है, चित्रकार हैं, एक नंबर के साहित्यिक अखाड़िया हैं, सी.आई.ए. के खांटी एजेंटों में एक हैं, नक्सलवादियों को अन्दर ही-अंदर बम बनाने का प्रशिक्षण देते हैं। अज्ञेय के बहुआयामी व्यक्तित्व के बारे में जितने किस्से सुनता उतनी ही उत्कंठा बढ़ती जाती थी। यह उस दौर की बात है जब तरुणाई की ‘रौ’ में बेखौफ इतराता फिर रहा था। देश में आमूलचूल परिवर्तन करने की कार्यवाही का ‘ब्लू प्रिंट’ मन में संजोए स्वप्नलोक में खोया रहता था। डाॅ. लोहिया की सप्तक्रांति के रंग में पूरी तरह सराबोर था।
उन्हीं दिनों संगत का असर था कि पत्रकारिता और साहित्य के हलके में भी कभी-कभी कविता, कहानी या रपट लिखकर घुसपैठ करने लगा था। तभी हिन्दी पत्रकारिता के क्षेत्र में ताजी हवा का झोंका आया, अज्ञेय ‘दिनमान’ लेकर प्रकट हुए थे। समाज को सही तरीके से समझने की तमीज हमें ‘सच्चिदानंद वात्स्यायन’ द्वारा संपादित ‘दिनमान’ से ही मिलती थी। इतना ही नहीं, समाज के साथ अनेकों-अनेक संदर्भों के रिश्तों की परिभाषा भी ‘दिनमान’ ने ही तब दी थी। यह कहना सच होगा कि उस दौर में मेरे जैसे अनेकों-अनेक परिवर्तन के लिए आकुल युवजनों को दिनमान से राजनीति की ‘लाइन’ मिलती रही। हम समाजवादी युवजनों का तो ‘दिनमान’ मानो मुखपत्र था। मेरे लिए तो बड़ी बात यह भी थी कि डाॅ. लोहिया को ‘दिनमान’ में खूब जगह मिलती थी। पूंजीपति के पैसे से निकलने वाले पत्र को परिवर्तन की राजनीति का मुखपत्र बनाने का बड़ा काम अज्ञेय जैसी दृष्टि वाला क्रांतिकारी ही कर सकता था, जिसके लिए एक समूची पीढ़ी उनकी विशेष ऋणी है। किसी युवा पत्रकार को यदि हिन्दी पत्रकारिता सीखनी हो तो आज भी वात्स्यायनजी द्वारा संपादित दिनमान का एक एक अंक पाठ्यपुस्तक की तरह संदर्भ का काम करेगा।
‘अरे यायावर रहेगा याद?’ के रचयिता अज्ञेय वहां भी खूब याद आए थे, जब यायावरी करते हुए बुद्व की निर्वाण स्थली कुशीनगर (कसया) पहुंचा था। मृण्मय कुशीनगर के खुदाई-शिविर में पुरातत्ववेत्ता डाॅ. हीरानंद शास्त्री की चौथी  संतान के रूप में ‘सच्चा’ का जन्म हुआ था, संभवतः इसीलिए सच्चिदानंद आजीवन  चिन्मय तलाशते रहे थे। यहां यह उल्लेख करना अप्रासंगिक न होगा कि सच्चिदानंद वात्स्यायन का बचपन का नाम ‘सच्चा’, ललित निबंधकार का नाम कुट्टिचातन, रचनाकार नाम अज्ञेय (जैनेन्द्र-प्रेमचंद का दिया नाम है-अज्ञेय) यह नाम अनिच्छित रूप से वात्स्यायन जी की कहानी ‘अमरवल्लरी’ से जुड़ा था।
काशी स्थित बाला घाट की सीढ़ियों के मुहाने पर कैमरा लटकाए अज्ञेयजी को पहली बार सप्रयास देखा था। उन दिनों अज्ञेय जब भी काशी आते कला पारखी भारत कला भवन के संस्थापक रायकृष्णदास  के यहां ही उनका ठहरना होता। जहंा संभवतः 1937 में पुराविदों के काशी सम्मेलन में अपने पिता के साथ वे राय साहब से पहली बार मिले थे। अपनी किताब ‘स्मृति-लेखा’ में गहरे संस्कारों वाले राय साहब के बारे लिखा भी- ‘...यह स्मृति उस जीवन्त और अर्थगर्भ अतीत का प्रतिलेख तैयार करती जाती थी जो भविष्य की लीकें डालता है और उन्हें स्नेह से सींच कर पूरे समाज की अग्रगति के लिए चिकना बनाता है।’ (पृष्ठ 37)
एकांगी ही सही, रिश्ता बहुत पुराना रहा है। इस आत्मीयता भरे रिश्ते को कोई नाम देना जरूरी भी नहीं है। हां, यह जरूर है कि बालाजी मंदिर घाट में प्रथम दर्शन और डाॅ. विद्यानिवास मिश्र के घर पर हुई पहली मुलाकात के वक्त यह सोचा भी न था कि कभी उनके निकट बैठकर ‘दिल्ली में’ उनके हाथ से बनाये हुए गुलाब जामुन के रंग स्वाद का अवसर मिलेगा। अवसर पत्रकार ओम थानवी के साथ-संगत से ही प्राप्त हुआ था। ‘दिव्य-भोजन’ मुझ बनारसी की कमजोरी है, इसके लिए ‘मधुमेह’ को ठेंगा दिखाने में भी नहीं हिचकता हूं। यहां जयपुर में राजस्थान प्रौढ़ शिक्षण समिति के सौजन्य से, रमेश थानवी के सान्निध्य में एकाधिक बार अज्ञेयजी के साथ भोजन का अवसर मिला। एकबार की बात है कि एम.आई. रोड के एक होटल में चलन के अनुसार रमेशजी पनीर-मलाई वाली सब्जियों का आर्डर दे रहे थे तो वात्स्यायनजी ने टोक कर कहा था, ‘थानवीजी फैन्सी भोजन क्यों मंगवा रहे हैं, साग मंगवाइये’, मांसाहारी अज्ञेयजी का आग्रह हमें रुचा था।
यह और बात है कि ‘वत्सल निधि’ और ‘राजस्थान प्रौढ़ शिक्षण समिति’ के संयुक्त तत्वावधान में ‘परिवेश और साहित्य’ पर हुए ग्यारह दिवसीय लेखक शिविर में भी उनका सामिष भोजन के प्रति कोई आग्रह नहीं दिखा था। इतने निकट रहने-देखने-सुनने के फलस्वरूप उनके बारे में गढ़े किस्सों को तार-तार होता पाया था। माउंट आबू शिविर से कुछ ही वर्ष पहले मैं राजस्थानवासी बना था। ‘नक्की-झील’ पर भी मुझे रेगिस्तान की छवि ही दिमाग में तारी रही थी। अज्ञेय जी को निहारता और सोचता था आखिर कितने रंग हैं, कितनी छटा है। यह भी याद आया था कि जब 1967 में बिहार सूखे से बेहाल पड़ा था। तब वे स्वयं युवा पत्रकारों की टीम के साथ ‘सूखा’ कवर करने बिहार के गांव में गए थे। आजाद भारत की हिन्दी-भाषी गरीब जनता को पहली बार तभी पता चला था कि सूखा और अकाल दैवी प्रकोप नहीं सरकारी नालायकी का ही परिणाम होता है। अज्ञेय ने पत्रकारिता के जरिये समाज को उसकी स्वतंत्र हैसियत लौटाने की मुहिम छेड़कर एक नयी दिशा दी थी। हिन्दुस्तान की गरीब शोषित जनता के पैरोकारों को पहली बार अपनी भाषा और मुहावरों से जुड़ी पत्रिका मिली थी, जिसने उसे न केवल एक नया संस्कार दिया, बल्कि उसकी सामाजिक राजनैतिक समझ में भी इजाफा किया था।
मैं भूल नहीं पाया हूं कि ‘सूखा’ शीर्षक से ‘दिनमान’ के मध्यवर्ती पृष्ठों पर सर्वेश्वरदयाल सक्सेना, कुंवरनारायण और त्रिलोचन शास्त्री की कविता के साथ ही अज्ञेय ने अपनी एक छोटी-सी कविता भी दी थीः 

न जाओ 

अन्न की कमी का रोना रोने 
विधायक के पास न जाओ 
अन्न से 
विधायक सस्ता हैः 
अन्न की वसूली में 
सरकारें भी सुस्त हैं- 
विधायकों की खरीददारी में 
हर दल दिलेर हैं!

हमें ‘सूखे की राजनीति’ को समझने में अज्ञेय की कविता से भी मदद मिली थी। कविता के भीतर छुपे अर्थ के खुलने के बाद जो समझ बनती हैं, वह व्यक्ति को राजनीतिक दृष्टि से संपन्न ही बनाती है। मनुष्य की अस्मिता का एहसास कराने वाली यह छोटी-सी कविता उस दौर में बड़ा अर्थ रखती थी। तब शब्दों का इस कदर अवमूल्यन नहीं हुआ था और न ही राजनीति का अपराधीकरण हुआ था।
सहृदय अज्ञेयजी के राजनीतिक सरोकार को लेकर समय-समय तूफान खड़ा किया जाता रहा, हालांकि इससे अज्ञेय के विराट व्यक्तित्व पर कभी कोई असर नहीं पड़ा। अनर्गल बहस जरूरी खड़ी होती रही है। उनका ‘रेडिकल मानववादियों’ के प्रणेता एम.एन. राय से सीधा संपर्क रहा। पंड़ित नेहरू से लगाकर जयप्रकाश, लोहिया से संपर्क तो जगजाहिर है। उन्होंने जयप्रकाश नारायण के आग्रह पर ‘एवरीमैन्स वीकली’ का संपादन भी किया था। यों स्वभाव से विनम्रता की मूर्ति अज्ञेय गांधी के निकट थे। कभी उन्होंने भगतसिंह और चंद्रशेखर आजाद के साथ आजादी की लड़ाई लड़ी थी। पर धीरे-धीरे वे गांधीजी के रास्ते की ओर आए। गांधीवादियों की पत्रिका ‘गांधी मार्ग’ के वे मार्गदर्शकों में रहे। समाजवादियों से उनके रिश्ते भी ठोस रहे।
लेकिन, इसके बावजूद, किसी विचारधारा-विशेष के वे अनुगामी कभी नहीं रहे। उनकी तरह का स्वाधीन चेता व्यक्ति, जो प्राणीमात्र की आजादी का पक्षधर रहा हो, और जो उस दिशा में प्रयत्न भी करता रहा हो अनुगमन नहीं ही कर सकता था। उन्हें पूंजीवादी खेमे का माना जाता रहा, बिना किसी आधार की पहचान किये हुए। लेकिन उन्होंने स्वयं ही कहा था कि, ‘‘मैं पूंजीवादी खेमे में कभी नहीं रहा, लेकिन जो लोग कहते हैं, उनको तकलीफ इस बात की है कि उनके खेमे में नहीं हूं और क्यों नहीं हूं। मैं तो समझता हूं कि लेखक किसी खेमे में नहीं रहता, क्योंकि उसका यह अधिकार बना रहना चाहिए कि वह सभी की अच्छी बातों की तारीफ भी कर सके तो सभी की गलत बातों की या संकीर्ण चिंतन का दोष भी देखे और दिखा सके।’’
अज्ञेय लोकतांत्रिक पद्धति को बेहतर मानते ही नहीं थे, अपनी जीवनचर्या में प्रयोग भी करते रहे। मुझे वत्सल निधि और राजस्थान प्रौढ़ शिक्षण समिति के संयुक्त प्रयास से आयोजित माऊण्ट आबू के लेखक-शिविर की याद आती है, जहां नये-पुराने लेखकों को लोकतांत्रिक पद्धति से ही अज्ञेय साथ लेकर चले थे। उन अविस्मरणीय ग्यारह दिनों की स्मृतियों में कई दिनों की स्मृतियों में कोई दिन ऐसा नहीं था कि जब उन्होंने अपने विराट व्यक्तित्व से आतंकित किया हो। उनके व्यक्तित्व की ऊंचाई डराती नहीं, पास और पास आने को लुभाती रही है।
                                                          छायाकार: ओम थानवी